उदासी चेहरा

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उदासी चेहरा

​हमारे समाज में स्त्री (नारी) को पुरूष के अर्द्धांगिनी के रूप में स्थान दिया गया है, जिसके बिना पुरूष किसी भी कर्त्तव्य की पूर्ति नहीं कर सकता यह भारतीय समाज का दुर्भाग्य है कि वैदिक और उत्तर वैदिक काल के पश्चात् हमारे समाज का मौलिक व्यवस्थाएँ रूढ़ियों के रूप में परिवर्तित होने लगी, फलस्वरूप स्त्रियों में लज्जा, ममता और स्नेह के गुणों को उनकी दुर्बलता समझकर पुरूषों ने उनका मनमाना शोषण करना आरंभ कर दिया। ऐसी प्रवृतियों को स्मृतिकारों और धर्मशास्त्रों का आशीर्वाद प्राप्त होने के कारण स्त्री धीरे-धीरे परतंत्र, निस्सहाय और निर्बल बन गयी। वैदिक काल, उत्तर वैदिक काल तथा धर्मशास्त्र काल में भी स्त्रियों को विश्वास दिलाया गया कि पति ही स्त्री के लिए देवता हैं और विवाह को उसके जीवन का एक मात्र संस्कार है। अनेक पौरानिक गाथाओं और उपाख्यानों को ईश्वर द्वारा रचित बताकर सतियों की कथाओं का प्रतिपादन किया गया। मनु-स्मृति में यहँ तक कह दिया गया कि स्त्री कभी भी स्वतंत्र रहने योग्य नहीं है, बचपन में वह पिता के अधिकार में, युवावस्था में पति के वश में तथा वृद्धावस्था में पुत्र के नियंत्रण में रहें। इस कारण से स्त्रियों की सम्पति के अधिकारों से पूर्णतया बंचित कर दिया गया और स्त्रियों के मानसिक रूप से ही अयोग्य तथा दुर्बल सिद्ध करने के अनेक भ्रमपूर्ण प्रचार किये गये।
जब भारत में पहले पहल लड़कियों के लिए कुछ स्कूल खोले गये तो रूढ़ीवादी तबकों ने उसका जबरदस्त विरोध किया। किसी की हिम्मत नहीं थी कि वो समाज से लड़कर अपनी बेटियों को स्कूल भेंजे। स्कूल जाने वाली लड़कियों के परिवारों  का सामाजिक और जातीय बहिष्कार कर दिया गया। आजादी के बाद भी परिवार का मुखिया पुरूष था। घर को उसी के मर्जी पर चलना था। महिलाओं की सीमाएँ अब भी तय थी। घूंघट प्रथा भी जारी थी। मर्दों की दुनिया में शोषण और हिंसा की शिकार औरतों के बारे में किसी दार्शनिक ने कहा है कि ‘‘स्त्री दुनिया का आखिरी उपनिवेश है।’’ लेकिन आज आंखों के सामने पसरी हकीकत भी चिल्ला चिल्लाकर बता रही है कि उत्पादन तंत्र में महिलाएँ हाशिएं पर नहीं रही। वे बड़ी तेजी से अर्थचक्र के केन्द्र की ओर बढ़ रही है। बोस्टन कंसल्टेंसी गु्रप की एक ताजा रिपोर्ट बता रही है कि दुनिया भर के उपभोक्ता कुल लगभग 18.4 लाख खरब डॉलर (लगभग 920 अरब रूपये) बाजार खरीददारी पर खर्च करते हैं और इस राशि का 65 प्रतिशत हिस्सा 12 खरब डॉलर यानि लगभग 600 खरब रूपये महिला उपभोक्ताओं के पर्स से निकलता है।  यह राशि भारतीय अर्थव्यवस्था के कुल आकार से तकरीबन 10 गुणा ज्यादा है। 
भारत में आज की तारीख में लगभग 57 करोड़ महिलाएँ है और उन्होंने मार्केटिंग के दिग्गजों को नाको चने चबवाए हुए हैं। भारर में 57 करोड़ महिलाओं में से 14 करोड़ कामकाजी महिला वर्ग में आती है और उनमें से सिर्फ 20 प्रतिशत शहरों में काम करती है। गाँव देहात में कुल महिलाओं में से 90ः खेती-बाड़ी में हाथ बँटाती है। आज स्कूल, कॉलेज, सेल्समैन काउंटर, ईट गारा ढ़ोने, पत्थर कूटने की जगहे, दफ्तरों, होटलों के रिसेप्शन, पेट्रोल पम्प, टैक्सियाँ, पत्रकारिता, अकांउटिंग, मार्केटिंग इत्यादि में काम कर रही है। सिर्फ भारी मशीन तथा विभिन्न विभाग के उच्च पदों पर बराबरीपूर्ण भागीदारी अभी भी एक सपना है।
क्या आज भी पुरूष वर्ग औरत की कमाई खानेवाला और ‘जनानियों के राज’ जैसे बीमार सामंतवादी जुमलों से क्योंकर आजाद कर लिया? फिर भी जिस तरह प्रेशर कुकर और वाशिंग मशीन ने औरत की आजादी में एक महान और युगांतकारी भूमिका निभाई, उसी तरह औरतों के खिलाफ मोर्चा खोल बैठे समाजशास्त्र को अर्थशास्त्र ने भी ऐतिहासिक शिकस्त दी।
वैश्विक स्तर पर भी महिलाएँ शोषण का शिकार हैं।
    बंगलादेश, यूथोपिया, तंजानिया जैसे देशों में जहाँ 50ः से अधिक महिलाएँ शारीरिक या यौन उत्पीड़न का शिकार होती है। वहीं अमेरिका में 20ः इंगलैंड में 30ः एवं जापान में 20ः शोषण के शिकार हैं। पूरे विश्व में प्रत्येक पाँच महिलाओं में से एक यौन उत्पीड़न का शिकार होती है। भारत देश में महिलाओं पर सबसे अधिक अत्याचार बिहार में होते हैं। यहाँ अत्याचार के 62.2 : मामले घटित होता है। इस मामले में दूसरा स्थान राजस्थान है। यहाँ 46.3 : मामले देखने को मिलता है। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष की एक हॉलिया रिपोर्ट के अनुसार भारत में 15 से 49 वर्ष की आयु की लगभग दो तिहाई विवाहित महिलाएँ हिंसा का शिकार होती है। इसमें पिटाई, दुष्कर्म एवं यौन प्रताड़ना शामिल है। गर्भावस्था के दौरान महिलाओं के साथ हिंसा की दर भारत में सर्वाधिक है।
    राष्ट्रीय अपराध की अभिलेख ब्यूरों के आँकड़े पर अगर एक दृष्टि डाली जाए तो भारतीय महिलाओं की खराब दशा का साफ तौर पर पता चलता है। रिपोर्ट के अनुसार हर चौथे मिनट पर एक महिला का उत्पीड़न होता है। हर पन्द्रहवें मिनट पर एक महिला से छेड़छाड़, हर 53 मिनट पर एक यौन उत्पीड़न, हर 9 मिनट पर पति या संबंधी से उत्पीड़न, हर 77 मिनट पर एक दहेज हत्या और हर 29 मिनट पर एक दुष्कर्म होता है। 
    यूनिसेफ के मुताबिक अफ्रीका और दक्षिण एशियाई देशांं की महिलाएँ अपने ही परिवार के सदस्यों के हाथो बेच दी जाती है। न्ण्छण्व्ण्क्ण्ब्ण् के अनुसार 80ः महिलाएँ जबरन देह व्यापार की आग में झोंक दी जाती है। वहीं ब्ण्प्ण्।ण् की एक रिपोर्ट कहती है कि 45,000 से 50,000 महिलाओं के हर साल विभिन्न देशों से अमेरिका में देह व्यापार के लिए लगाया जाता है। अमेरिकी गृह मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार पिछले कुछ सालों में भारतीय महिलाओं की तस्करी के मुख्य केन्द्र के तौर पर विकसित हो रहा है।
भारत में दहेज हत्या भी प्रतिवर्ष बढ़ रहा है।
वर्ष    हत्या
1991    639
1992    819
1993    774
1994    830
1995    1034
1997    1041
1998    6917
वर्ष 2000 में 1421 बलात्कार के मामले सामने आए। असल में भारतीय नारी की जिन्दगी कामोबेश आज भी वैसी की वैसी ही है। जैसा प्राचीन काल (दास प्रथा युग एवं सामंतवादी युग) अर्थात मुगलों के शासनकाल में थी। असल में पुरूष प्रधान इस समाज का असली चेहरा कुछ और ही रूप लिये हुए हैं। समाज में नारियों का स्थान आज भी महज एक भोग्या से ज्यादा कुछ नहीं है। आए दिन बलात्कार की घटनाएँ इस सत्य का जीवंत उदाहरण है। हद की बात तो यह है कि अदभुत संस्कृति वाले इस देश में महज पाँच हजार रूपये के बदले महिलाओं की नीलामी तक होती है। और हमारा समाज मूकदर्शक बना तमासा देखता रहता है। 
    जी हाँ, आंध्रप्रदेश भारत का एक ऐसा राज्य है, जहाँ औरतों की निलामी कोई अनहोनी घटना नहीं मानी जाती। यहाँ आप मात्र पाँच हजार रूपये में साल भर तक एक औरत को हवस संतुष्टि का माध्यम बना सकते हैं। 16 से 30 वर्ष की आयु वर्ग की महिलाओं की नीलामी दर अलग-अलग होती है। आप अपनी आर्थिक स्थिति के अनुसार यौन संतुष्टि हेतु स्वतंत्र हैं।
    औरतों की निलामी का मुख्य केन्द्र राज्य के समुद्रतटीय जिले तेनाली, इरूल, निदादाबोल, राज्यमुंदरी, बेलपुर, तनुकु और तेदापल्लीगुदम है। इन जिलों में हर वर्ष 16 से 30 वर्ष की लगभग 10 महिलाओं की सरे आम निलामी हुई। इन महिलाओं को विभिन्न दरों यानी 5 हजार से लेकर तीस हजार रूपये की दर पर बेचा जाता है। आन्ध्रप्रदेश में बड़े पैमाने पर सेक्स उद्योग चलाया जाता है। अब तो हर छोटे-बड़े षर में चल रहा है। बड़े-बड़े पूंजीपति इस उद्योग को जिंदा रखे हुए है। इस उद्योग के पीछे इन पूंजीपतियों द्वारा भारी पैमाने पर पूँजी निवेश किया जाता है। लगभग 200 पूंजीपति अभी भी इस उद्योग से जुड़े हुए है।
    पुलिस एवं प्रशासन के यहाँ होने वाली औरतों की नीलामी की पूरी जानकारी रहती है, पर आज तक पुलिस प्रशासन ने इस घिनौने कृत्य को रोकने का प्रयास नहीं किया। 
    वर्षों पहले हॉलीवुड में फिल्ब बनी थी जिसमें नायिका को जब यह पता चलता है कि वर्षों पूर्व बिछड़ा हुआ उसका अपना बेटा उससे मिलने आया है तो वह बिजली की गति से उस कमरे की तरफ भागती है जहाँ उसका बेटा बैठा हुआ उसकी का इंतजार कर रहा था। दरवाजे को धक्का देकर ज्यों ही वह अंदर प्रवेश करती है वह सन्न रह जाती है। उसकी आँखे फटी रह जाती है। उसका बेटा भी उसे देखकर चकरा जाता है। असल में वह नायिका जो जिस्मफरोशी का धंधा करती थी, इस युवक को अब तक अपना ग्राहक समझकर कई-कई बार उसे अपना जिस्म सौंप चुकी थी। यहाँ इस संदर्भ का जिक्र करने का एक मात्र उद्देश्य यह पूछना था कि क्या आज हम उसी विडम्बनापूर्ण स्थिति को जीने के लिए विवश नहीं हैं? इस सामंतवादी एवं साम्राज्यवादी युग में जबकि सारी दुनियाँ एक खुले बाजार के रूप में तब्दील हो चुकी है, ऐसा नहीं लगता है कि यहाँ संबंधों ने सभ्यता-संस्कृति के सारे आवरण उतारकर माँ-बेटे की भावनात्मक निकटता तक की हत्या कर डाली है। औरत माँ ही तो है जिसे हम बहन, पत्नी, बेटी आदि के रूप में स्नेह-सम्मान और श्रद्धा देते आ रहे हैं। आज सोचना यह है कि हमने औरतों को बाजर में क्यों बैठाये हुए हैं? क्यों हम गाँवों के चौपालों पर, नाट्य-मंचों पर तथा महफिलों में औरतों को घुंघरू बांधवाकर नचावते हैं और उसकी बेबसी को अदा समझकर तालियाँ पीटते हैं-झूमते हैं? सम्मान देने के बदले यह शोषण क्यो? ‘नारी को देवी कहकर पुकारने वाले इस देश में जी0बी0रोड, सोनागाछी तथा चतुर्भुज स्थान इत्यादि जैसी यौन मंडियाँ क्यों है? सदियों से हमने नारी को कभी देवदासी बनाकर तो कभी रखैल बनाकर उसकी मर्यादाओं के साथ खिलवाड़ किया है। रंभा और मेनका के रूप में नारी कभी इन्द्र के दरबार में नाचा करती थी और आज सरे आम नाचने पर मजबूर है। औरतों ने जिस मर्द को जन्म दिया उसी मर्द ने उसे कोठे पर बिठा दिया है।
    साम्राज्यवादी और सामंतवादी अपसंस्कृति के आक्रमण के फलस्वरूप गाँव-कस्बों तक पहुँच चुके उच्छृंखलता के नग्न फैशन ने तो इस बाजार के लिए सस्ते और सुलभ ‘कच्चे माल’ की उपलब्धता सुनिश्चित करा दी है। यौन-हिंसा ने समूची मानवता के लिए खतरा उत्पन्न कर दिया है। बाल वेश्याओं तथा कॉल गर्लों की दिन प्रतिदिन बढ़ती तादात क्या इस बात के खुले संकेत नहीं हैं कि आने वाले दिनों में हमारे सारे मानवीय संबंध, हमारी लोक आस्था से जुड़ी हमारी संस्कृति, सब इतिहास की बातें होकर रह जायेगी।
    आज बलात्कार की शिकार बालिका की उम्र 12 से 13 वर्ष से कम ही होती है। बाल यौन शोषण की ज्यादातर घटनाएँ सामाजिक लोक-लज्जा, पुलिस और कानून के झमेलों के कारण दबा दी जाती है। आखिर क्यों होते हैं, बाल यौन शोषण? आखिर इस शोषण की प्रवृति को कैसे रोका जा सकता है? अमेरिका और फ्रांस में भी बच्चों के साथ बलात्कार होते हैं। जो बलात्कार नहीं करते, वे बाल वेश्यावृति में शामिल होते हैं। अमेरिकी देशों में बाल यौन शोषण एक साधारण घटना है। यहाँ पचास-साठ साल के पुरूष बड़ी आसानी से कमसिन लड़कियों के साथ शारीरिक संबंध स्थापित करते हैं। वेश्यावृति करना या कराना, बलात्कार करना तथा बहुगामी होना सामंतवादी, पूँजीवादी, साम्राज्यवादी संस्कृति तथा पुरूषों की वर्चस्ववादी नीति का प्रतिफलन है। यदि आरंभ से इसका विरोध किया जाय तो ऐसे दृश्य आज देखने को नहीं मिलती।
कहा जाता है कि साहित्य की तरह फिल्मों के माध्यम से भी किसी समाज को जाना-पहचाना जाता है। लेकिन भारतीय जन-संस्कृति एवं समाज से अनभिज्ञ कोई व्यक्ति हाल के भारतीय फिल्मों को देखे तो वह निश्चित रूप से गलत निष्कर्षों पर पहुँचेगा। भारत का हिन्दी भाषी क्षेत्र सबसे अधिक पिछड़ा, जड़ और रूढ़िवादी क्षेत्र है। यह समाज अभी भी मध्ययुगीन मान्यताओं से मुक्त नहीं हो सका है। आज भी इस समाज में प्रेम विवाह करने वालों की हत्या कर दी जाती है। ऐसे में अनैतिक सम्बन्धों एवं उन्मुक्त यौनाचार पर बनने वाली हिन्दी फिल्मे देखकर थोड़ा आश्चर्य होता है। दरअसल, ये सारी फिल्में साम्राज्यवादी अपसंस्कृति, मर्दवादी नजरिये से बनायी जाती है जिसका काम पुरूषों की कामोत्तेजना को भड़काना है। इस फिल्मों की अभिनेत्रियाँ न तो आज की स्वतंत्र स्वावलंबी स्त्रियों का प्रतिनिधित्व करती है और न ही समाज को कोई दिशा दे पाती है। ये साम्राज्यवादी संस्कृति एवं पुरूषवादी व्यवस्था से परिचालित स्त्रियाँ हैं। जल्द से जल्द पैसा कमाने की धुन में ये अभिनेत्रियाँ कामोत्तेजक दृश्य दिखाने के लिए सहर्ष तैयार हो जाती है। इस तरह ये स्त्रियाँ भी साम्राज्यवादी संस्कृति एवं पुरूषवादी सोच एवं नियंत्रण से मुक्त नहीं हो पायी है। आज स्त्रियाँ घर से बाहर निकलती है तो उनके सामने बाजार होता है और वह खुद बाजार की एक वस्तु बन जा रही है। आज हर लड़की मिस इंडिया या मिस वर्ल्ड बनना चाहती है। यह सब उन्हें माडलिंग के क्षेत्र में सींच लाता है। लेकिन कितनी लड़कियाँ ऐश्वर्या राय और सुष्मिता सेन बन पाती है? देह मटकाना, ऊल-जुलूल कपड़े पहनना और रेम्प पर कुल्हे मटकाते हुए चलना तो बिल्कुल आसान है। कठिन है किसी क्षेत्र में विशेषज्ञता हासिल करना।
महिला जीवन के ऐतिहासिक पहलु को जानने के लिए अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस को समझना होगा। अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस की शुरूआत महिलाओं के हक में प्रथम ऐतिहासिक जीत दर्ज करने के साथ हुआ। 8 मार्च 1857 को अमेरिका में कपड़ा मिल की मजदुर बहनों ने काम के घंटों को 16 घंटे से घटाकर 10 घंटे करने तथा पारिश्रमिक बढ़ाने हेतु अपनी संगठन क्षमता का परिचय दिया और 8 मार्च 1908 को उनकी इन माँगों की पुर्ति के साथ ही 8 मार्च की ताकत और पवित्रता ऐतिहासिक स्वरूप ग्रहण करने लगी। कालान्तर में संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी 8 मार्च 1985 तक अंतराष्ट्रीय महिला दशक की घोषणा की। निष्कर्ष रूप में 8 मार्च दुनिया की आधी आबादी की प्रेरणा प्रदीप बन गया।
भारत में समय-समय पर महिलाओं के हितों की रक्षा के लिए कानून और अधिनियम बनते रहे हैं। पर क्या ये कानून अपना पूर्ण औचित्य कायम कर पाए हैं? 1994 में प्रसव पूर्व भ्रूण हत्या निदान अधिनियम लागू किया गया। समान कार्य के लिए समान पारिश्रमिक अधिनियम 1976 में बनाया गया। महिलाओं को घरेलू हिंसा से निजात दिलाने के लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 498 ‘ए’ प्रमुख कानुनी यंत्र है। वेश्यावृति निवारण अधिनियम भी बनाया गया। दहेज की कुप्रथा को रोकने लिए के लिए दहेज निषेध अधिनियम बनाया गया। कार्यरत महिलाओं की प्रसूति से पूर्व और बाद में स्वास्थ्य लाभ हेतू विशेष सुविधा प्रसुति प्रसुविधा अधिनियम बनाया गया। महिलाओं को घरेलू हिंसा से रक्षा के लिए सुरक्षा अधिनियम 2005 के रूप में नया कानून बना एवं लागू हुआ। परन्तु इस सख्त कानून के लागू होने के चार वर्ष बाद भी इसका खास असर अब तक दिख नहीं पा रहा है। 
महिलाए निरन्तर विभिन्न माध्यमों से प्रताड़ित हो रही है। महिला चाहे किसी वर्ग की हो अगर वह अपनी जिन्दगी का कोई महत्वपूर्ण निर्णय लेती है तो उसके परिवार के पुरूष वर्ग का रवैया कभी भी उसके प्रति सौहार्दपूर्ण नहीं रहता। आज इस 21वीं सदी में भी लड़कियों की भावनाओं को मान्यता नहीं देता। आज औरतों को अपने स्वाभिमान की पहचान होनी चाहिए तथा उन्हें अपने को बाजार की वस्तु नहीं बनने देनी चाहिए। मीडिया, मॉडलिंग और फिल्म के चकाचौंध ने स्त्री को बिकाऊ बना दिया है। कोई भी विज्ञापन औरत के अर्धनग्न तस्वीर के बिना पूर्ण नहीं होती। मीडिया ने औरतों में यह मानसिकता पैदा कर दी है कि औरत का शरीर ही उसकी शक्ति है।
देश की राजधानी में हर माह नौ महिलाएँ दहेज की भेंट चढ़ रही है। दहेज का दानव हर साल सौ से अधिक दुल्हनों के सुनहरे सपनों को साकार होने से पहले ही चकनारूर कर रहा है। वर्ष 2005 में भी पूरे वर्ष दहेज के मौत के मामले सुर्खियों में छाये रहे। पिछले एक दशक में दहेज के कारण हुई मौत के मामले पर नजर डाले तो यह आंकड़ा डेढ़ सो पार भी कर चुका है। 
सरकार व पुलिस की लाख कोशिशों व प्रचार के बावजूद राजधानी में जब दहेज का घिनौना खेल धड़ल्ले से चल रहा है तो देश के अन्य राज्यों की हालत का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है। गत दिनों नरेला इलाके में एक महिला विनोद देवी (25) ने अपने लड़के आर्यन (3) बेटी आरजू (5) के साथ ट्रेन के नीचे कटकर जान दे दी। दो मासूम के साथ एक महिला की आत्महत्या करने के मामले में पुलिस को हिलाकर रख दिया है। मामले की जाँच में पता लगा कि पति दहेज मांगत था। इसी माह पुलिस ने मुखर्जी नगर इलाके में एक स्कूल के शिक्षक को गिरफ्तार किया। इस शिक्षक की पत्नी ने फाँसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी। जांच करने पर पता चला कि मामला दहेज का है।
आने वाले 50 वर्षों में बहुओं का मुँह देखने के लिए तरस जाएंगे लोग क्योंकि पुत्र की कामना में कन्या भू्रणों की हत्या बढ़ रही है और बाल-बालिकाओं के अनुपात में तेजी से गिरावट आ रही है। 1991 की जनगणना में बालिकाएँ प्रति हजार में 945 के मुकाबले 2001 तक यह आंकड़ा घटकर 927 रह गया है। इसका एक अन्य कारण पुत्र की चाहत में कन्या भू्रणों का गर्भपात कराना है। इंडियन मेडिकल एशोसएशन के अनुसार देश में प्रति वर्ष लगभग 50 लाख कन्या भ्रूणों का गर्भपात कराया जा रहा है जो महिलाओं के प्रति एक प्रकार की क्रूरता है क्योंकि जिस भ्रूण का गर्भपात कराया जाता है वह न तो चीख सकता है और न ही अपनी रक्षा करने में सक्षम है। यह एक विडम्बना ही है कि महिलाएँ ही महिलाओं की दुश्मन साबित हो रही है। शहरों में पढ़ा-लिखा तबका गर्भ में पल रहे बच्चों का जन्म से पहले परीक्षण कराकर जान लेता है कि होनेवाला शिशु लड़का है या लड़की। इस काम को मानवता के रक्षक तथाकथित डाक्टर ही अंजाम दे रहे है। इस तस्वीर का दूसरा पहलू यह भी है कि दूर दराज के क्षेत्रों में लोग गर्भ पूर्व मंहगे परीक्षण तो नहीं करा पाते लेकिन अगर जन्म लेने वाली कन्या हुई तो उसे उसी वक्त दाई मौत की नींद सुला देती है। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, के कई ग्रामणी क्षेत्रों में कन्या शिशु के जन्म लेते ही उसका गला घोंट देना, मुंह में नमक भर कर मार देना आम बात है। आई0 एम0 ए0 के अनुसार देश के समृद्ध राज्यों पंजाब, हरियाणा, दिल्ली और गुजरात में भी स्त्री-पुरूष अनुपात प्रति हजार पुरूषों की तुलना में 900 से भी कम रह गया है। विशेषज्ञों के अनुसार ‘प्री बर्थ एलिमिनेशन ऑफ फिमेल्स’ पी0बी0एफ0 समाज में महिलाओं के प्रति बढ़ रहे हिंसक अत्याचारों में से एक है। चिकित्सा जगत की प्रगति का लाभ उठाकर अक्सर लोग गर्भपात करना पसंद करते हैं। चिकित्सा पेशे से जुड़े लोग इसे बढ़ावा दे रहे हैं क्योंकि देश में इसे निपटने के लिए सख्त कानून नही है।
आज भी हमारे समाज में दुष्कर्म, दहेज-हत्या या डायन बताकर मारने की घटनाएँ जारी है। पटना जिले में 2013 की पहली छमाही में 32 लड़कियों के साथ एकल या सामूहिक दुष्कर्म की घटनाएँ हो चुकी है। बेगूसराय जिला के मैखार गाँव में 27 अगस्त की रात 70 वर्षीय महिला को डायन बताकर उसकी नृशंस हत्या की गई। ईंट पत्थर से कुचलकर मारा गया। इससे पहले कई बार पंचायत भी बैठी थी, लेकिन पुलिस प्रशासन उस वृद्ध की सुरक्षा नहीं कर पाया।
भारत में हर वर्ष एक लाख छत्तीस हजार (1,36,000) माताओं की मौत होती है। अमेरिका स्थित गैर सरकारी संगठन सेव द चिल्ड्रेन द्वारा विश्व में माँ की स्थिति के बारे में जारी रिपोर्ट 2007 में यह जानकारी दी गयी है। रिपोर्ट के अनुसार इथियोपिया, कांगो और नाईजीरिया जैसे कम विकसित क्षेत्रों में भी हालात भारत से बेहतर है। 66 देशों में माताओं के स्तर का आकलन शैक्षिक, आर्थिक, राजनीतिक और स्वास्थ्य क्षेत्र की पृष्ठभूमि में किया गया और भारत को इस मामले में 61 वाँ स्थान मिला। रिपोर्ट में कहा गया कि भारत में माँ ही नहीं बल्कि बच्चों की हालात भी दयनीय है। भारत में कुल एक करोड़ बच्चों में से 19 लाख बच्चों की हर वर्ष मौत हो जाती है। वर्ष 2006 में गोपालगंज में एक महिला को नग्न अवस्था में गाँव में घुमाया गया। ऐसा समाचार आये दिन राज्य के विभिन्न स्थानों से मिलते रहते हैं। यही नहीं, डायन या चुड़ैल कहकर महिलाओं को बुरी तरह पीटने और कभी-कभी तो जान मार देने की घटनाएँ भी अक्सर होती रहती है। महिलाओं के प्रति सामाजिक सोच ये कड़वी हकीकत इस बात का प्रमाण है कि अधिकांश लोग मानसिक तौर पर आज भी मध्य युग में जी रहे हैं, जिसमें औरत को पैर की जूती, दासी या मात्र भोग्या समझा जाता था। बिहार की धरती पर नारी के वस्त्र सरे आम उतार लिये जाते हैं और समाज के तथाकथित सुधारक, महिला आयोग व अन्य महिला संगठन लाचार होकर सब कुछ देखते रहते हैं। बलात्कार पीड़ित महिला की जितना जनाजा आबरू लुटवाते समय नहीं निकलता उससे ज्यादा अदालत में निकल जाता है। इन्हीं बजहों से अधिकांश महिलाएं मुँह नहीं खोलती और दोषी साफ बरी हो जाते हैं। 12 अप्रैल 2014 को एक दिल दहला देने वाली घटना घटी। अपने पिता के साथ यात्रा कर रही 17 साल की एक युवती को छपरा में चार युवकों ने सरे आम ट्रेन से खींच लिया और पास ही एक दवा की दुकान में ले जाकर उसके साथ सामूहिक दुष्कर्म किया। कोई भी उस लड़की और उसके पिता की वेदना का सहज अनुमान नहीं लगा सकता। 
वर्ष 2013 के फररवरी माह में वैशाली जिला के दयालपुर गढ़ गाँव में गुरूवार को छेड़खानी का विरोध करने पर मनचले ने सोई अवस्था में 15 वर्षीय किशोरी के चेहरे पर तेजाब फेंक कर जख्मी कर दिया। हमले में किशोरी के चेहरे का ऊपरी हिस्सा, सीना व दोनों कलाईयां झुलस गई। वर्ष 2012 में समस्तीपुर में मनचलों की छेड़-छाड़ और यौन उत्पीड़न से तंग आकर स्नातक विज्ञान की एक होनहार छात्रा कंचन बाला ने आत्महत्या कर ली थी। उसने अपने दारूण दुख से भरे निर्णय से पहले जो सूसाइड नोट जीवित दुनियां के लिए छोड़ा, उससे पता चला कि पुलिस ऐसे मामले में कितनी संवेदनहीन, निष्क्रिय और महिला विरोधी है। कुछ ही महीने बाद पटना के पत्रकार नगर थानान्तर्गत गोपीपुर में रहने वाली 11वीं की छात्रा आभा रानी को भी वहीं सब झेलना पड़ा। फिर 19 फरवरी 2012 को उसने आत्म हत्या कर ली थी।
देश की 42 विज्ञान प्रयोगशालाओं में एक भी महिला डायरेक्टर नहीं है। भारतीय राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी के एक अध्ययन में यह तथ्य उजागर हुआ है कि विज्ञान के क्षेत्र में कार्यरत महिलाएं लैगिंक भेदभाव और शोषण के शिकार हैं। इसी तरह उत्तर प्रदेश में विधि विज्ञान प्रयोगशाला में कार्यरत एक महिला वैज्ञानिक ने राज्य महिला आयोग से शिकायत की कि उसका एक वरिष्ठ पुरूष सहकर्मी उसे गंदी व अश्लील गालिया एस0एम0एस0 करता है और जिंदगी बर्बाद करने की धमकी देता है।
16 दिसम्बर 2012 को दिल्ली में हुए गैंग रेप के बाद भड़के जनाक्रोश और उसके बाद सरकार द्वारा महिला सुरक्षा के लिए उठाए गए कानूनी प्रशासनिक कदमों का प्रभाव मापने की दृष्टि से देखा जाय तो महिलाओं का हालत बिल्कुल नहीं बदले हैं। दिल्ली में एक जनवरी 2013 से 15 फरवरी के बीच रेप के 181 मामले दर्ज किए गए। यानी राजधानी में औसतन प्रत्येक दिन बलात्कार की घटना घटती है। राज्य सभा में साल दर साल बढ़ते अपराधों का आंकड़ो पेश करते वक्त आर0 पी0 एन0 सिंह ने सफाई दी कि चूँकि कानून-व्यवस्था और पुलिस राज्यों का विषय है, इसलिए जिम्मेदारी राज्यों की है। ऐसे में उनसे पूछना वाजिब है कि राजधानी दिल्ली की पुलिस और कानून व्यवस्था पर तो केन्द्र सरकार का नियंत्रण है, फिर यहाँ महिलाओें का इज्जत लगातार तार-तार क्यों हो रही है। पंजाब के तरनतारण में पंजाब पुलिस द्वारा एक युवती और उसके पिता की बर्बर ढंग से पिटाई तथा बिहार के पटना में संविदा पर नियुक्त शिक्षकों पर जिनमें महिलाएं भी शामिल थी, पुलिसिया लाठीचार्ज ने देश की शीर्ष अदालत तक को झकझोर दिया। इन घटनाओं से संबंधित खबरों पर स्वतः संज्ञान लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने दोनों संबंधित राज्यों से स्पष्टीकरण भी माँगा। दूसरी ओर 4 मार्च 2013 को राजधानी में पूर्वात्तर राज्यों से आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पॉवर एक्ट (सशस्त्र बल विशेष अधिकार कानून) हटाने की माँग लोकर बारह वर्षों से भी अधिक समय से अनशन पर चल रही इरामे शर्मिला चानु ने न्यायिक सुनवाई के दौरान अदालत में कहा कि मैं जीना चाहती हूँ और अपनी जिंदगी से प्यार करती हूँ लेकिन पहले मैं न्याय और शांति चाहती हूँ। अहिंसा की समर्थक इस महिला ने नयायधीश को साफ कह दिया कि अगर सरकार अफस्पा हटाएगी, मैं तब ही मुख से भोजन ग्रहण करूँगी। इन राज्यों में अफस्पा कानून के बेजा इस्तेमाल पर मानवाधिकारवादी व महिला संगठन बराबर सवाल उठाते रहे हैं। सेनाकर्मियों पर आरोप लगाते रहे हैं कि वे इस कानून का इस्तेमाल आम जनता के खिलाफ लूटपाट, बलात्कार, मारपीट व हत्या के मामले में कर रहे हैं। इस कानून की आड़ में सेना एक साल तक किसी को भी जेल में रख सकती है। आज राज्यों की प्राथमिकताएँ बर्ल्ड बैंक, आई0एम0एफ0, एम0 एन0 सी0, विश्व व्यापार संगठन तय करता है। खाद्य, शिक्षा, स्वास्थ्य क्षेत्रों जेसी सेवाओं में सब्सिडी में कटौती का दबाव ऐसी ही अंतर्राष्ट्रीय कर्जदाता एजेंसियों की शर्तों का हिस्सा है। 
आज विश्व में अनिवार्य रूप से संवैतनिक मातृत्व अवकाश प्रावधान वाले देशों की संख्या 173 है। जबकि घरेलू हिंसा को गैर कानूनी घोषित करने वाले देशों की संख्या 125 है। कार्य स्थल पर यौन उत्पीड़न को गैर कानूनी घोषित करने वाले देशों की संख्या 117 है। ऐसे देश जहाँ पुरूष और महिला को समान कार्य के लिए समान वेतन दिए जाने का कानून है, उनकी संख्या 117 है। संपत्ति में महिलाओं को बराबर अधिकार देने वाले देशों की संख्या 115 है। 
सरकार की जनविरोधी आर्थिक और औद्योगिक नीतियों के कारणं पतनशील संस्कृति, अश्लीलता, शराबखोरी, अनैतिकता तेजी से बढ़ रही है। टी0वी0, पत्र-पत्रिकाओं, फिल्मों व सौन्दर्य प्रतियोगिताओं के माध्यम से अश्लीलता परोसी जा रही है, जिसमें नारी के जिस्म को उपभोग की वस्तु के रूप में पेश किया जा रहा है। महिलाओं और बच्चों को तस्करी के जरिये विदेशों में बेचा जा रहा है और देह व्यापार में लगाया जा रहा है। सामंतवादी और साम्राज्यवादी गिरगीट की तरह अपना रंग बलद-बदलकर महिलाओं का शोषण कर रहे हैं। हमारे समाज में सामंतवाद अपनी रक्षा के लिए हर किस्म के हथियारों का उपयोग कर रहे हैं। ढ़हते हुए सामंतवादी की विकृतियाँ धर्म और सम्प्रदाय जैसी आस्थाओं के सहारे जीवित रहती है। इसलिए हिन्दी के प्रसिद्ध कवि मैथिलीशरण गुप्त ने ठीक ही लिखा है,
‘‘अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी’’
आँचल में है दूध और आँखों में पानी’’।
जनमवादी कवि धूमिल ने भी लिखा है-
    एक आदमी रोटी बेलता है
    एक आदमी रोटी खाता है
    एक तीसरा आदमी भी है,
    जो न रोटी बेलता है,
        न रोटी खाता है,
    वह सिर्फ रोटी से खेलता है,
    मैं पूछता हूँ, यह तीसरा आदमी कौन है?
    मेरे देश की संसद मौन है।
    अतः उदासी चेहरा को खुशहाल बनाने के लिए सड़ी-गली व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष कर समाजवादी समाज का निर्माण करना चाहिए।

संदर्भ ग्रन्थ या स्त्रोत

1.    महालक्ष्मी सम्राट अंक 14 फरवरी 1999
2.    हिन्दुस्तान दिनांक 08.03.2010 पृष्ठ संख्या 11
3.    हिन्दुस्तान दिनांक 18.05.2005 पृष्ठ संख्या 9
4.    राष्ट्रीय सहारा दिनांक 08.03.2008 पृष्ठ संख्या 9
5.    दैनिक जागरण दिनांक 15.03.2013 पृष्ठ संख्या 10
6.    दैनिक जागरण दिनांक 16.03.2013 पृष्ठ संख्या 12
7.    रा0 सहारा दिनांक 09.03.2013 पृष्ठ संख्या 8
8.    हिन्दुस्तान दिनांक 17.10.2006 पृष्ठ संख्या 6  
         
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